Friday, September 9, 2011

नया जमाना है


                
                    जैसे-जैसे हम जवान  होते जा रहे है, वैसे ही ये आधुनिक विश्व थोडा ज्यादा ही जवान होता जा रहा है | भारत एक महान  एवं  विशाल देश है, जिसे  यदि मानचित्र पर खोजा जाये तो आसानी से मिल जायेगा | ये महान   देश जितना बड़ा है उतना ही बड़ा उसका दिल है | और आप सभी भी  जानते है | पहले प्रत्येक इंसान दूसरो के लिए जीता था , परन्तु अब हर इंसान अपने लिए ही जीता है | इमानदारी, त्याग , और अपनेपन का भाव शायद पुरातन कल तक ही जीवित रह सकता था | अब आधुनिक युग की शुरुआत हो चुकी है अर्थात नया जमाना |
इस दौर में कितना कुछ बदल गया है, और कितना कुछ बदलता जा रहा है, वो भी इतनी तेजी से | वास्तव में  भारत, अब भारत नहीं रहा, यह अब इंडिया हो चूका है |
इसीलिए कहते है ........

                         रामचंद्र कह  गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा ,
                         हंस चुगेगा दाना-रोटी, कव्वा मोती खायेगा !!

                 परन्तु अब इसकी जगह कुछ और चल रहा है......, न तो हंस दाना-रोटी खा रहा है और न ही कव्वा मोती..! यहाँ तो एक अजीब माजरा नजर आता है | हंस और कव्वों की जगह गैर सांड, अनारक्षित और भ्रष्ट तत्व भारत के मोती खाए जा रहे है | इनका न तो किसी इन्सान को पता है और न ही भगवन को | कब खा जाते है.., पता नहीं
 कब पाच भी लेते है, पता नहीं |     ....... लेकिन इन परिस्थितियों में आम जनता का क्या हाल हो रहा है, ये तो जनता ही जाने | 

        इन मंजरो को देख, हमें कुछ और ही समझ आता है, 
        कहा जाये हम, की जानेवाला ये रास्ता कहा जाता है,
        न बया होगी हमसे ,  इस नवीन युग       दास्ताँ   है,
        न जाने कब, ये किसे अपने  चुंगल में     फासता है |

                  इन नए हालातो को देखते हुए मुझे डर लगने लगा है कि अगर यही हाल चलता रहा तो आने वाली पीड़ियों का क्या होगा ? कैसे जियेंगे वो इस भ्रष्ट  वातावरण के भ्रष्ट लोगो के बीच ? किस प्रकार का माहोल मिलेगा उनको...एक बेहद अशुद्द और नाहक समाज जो किसी भी चीज की कीमत को नगण्य मानता हो, जो समजातीय प्राणी को शत्रु मानता हो , जो मात्र अपने स्वार्थ के लिए दूजे इन्सान को उपेक्षित समझता  हो |
अपने स्वार्थ मात्र के लिए वह किसी के साथ कुछ भी करने के लिए तैयार रहता हे....,इससे उसे क्या मिल सकता है, ज्यादा से ज्यादा रुपये | ये भ्रष्ट तो भूतो से भी खतरनाक है |

                   आप अखबारों के साथ तो उठते  से ही हो | रोज एक न एक दुर्घटना-पूर्ण खबर आती जरुर है |
किसी ने जमीन के लिए अपने भाई या बाप या चाचा को मर डाला अथवा प्रेमी  ने प्रेमिका के  पति को मार या प्रेमिका ने पति को मरवाया.....और ऐसी ही खबरे आम हो गई है जो कि किसी न किसी पन्ने पर जरुर छापी होती है | कोई चोर घर में चोरी कर के भाग जाता है तो कोई  रस्ते में चैन या पर्स छीन कर भागता है | परन्तु ऐसा होता ही क्यों है.....??              इसका मुख्य कारण है     "भ्रष्टाचारी" |  अगर देश  से  भ्रष्टाचारी  ही हट जाये तो न तो चोरी होगी और न कोई किसी को मारेगा |

                भ्रष्टाचारी  एक बहुत ही गंदे तरीके से फ़ैल चुकी है जिसकी कोई हद नहीं है | एक छोटे से चपरासी से लेकर बड़े-बड़े अधिकारी तक सब   भ्रष्ट हो चुके  है | यदि आप किसी सरकारी दफ्तर में एक बहुत ही छोटे से काम के लिए जाते हे तो सबसे पहले एक साधारण चपरासी अपना मुह खोलता है, उसके बाद बाकी के अधिकारी लोग | और हमें  भी उन चपरासियों का  मुह भरना ही पड़ता हे फिर  कही  जाकर  अधिकारियो  का नौम्बर  आता  है| काम तो छोटा रहता है लेकिन ये खुले हुए मुह के बन्दर गण उसके  दुगुना या तिगुना दाम ले लेते है | क्या अनुकूल है ? बिलकुल नहीं | कोई अमीर आदमी तो पैसा देकर अपना काम करवा लेगा लेकिन जो गरीब है, जिसे दो समय का भोजन तक नसीब नहीं होता, वह कहा से लाकर देगा पैसे ?    और हा ! यदि वह पैसे लाकर भी दे देगा तो फिर क्या वह खाना खा पायेगा ?   अपने बीवी- बच्चो का पेट भर सकेगा ?  
यह एक सच्चाई है जिसे  न तो सरकार छिपा सकती है और न ही कोई नेता या कोई मंत्री | यह आँखों देखी सच्चाई है | लेकिन इसकी शिकायत करे तो इसे नजर-अंदाज कर दिया जाता है, क्योकि सभी "एक ही थाली के चट्टे-बट्टे" रहते हे अर्थात मिले हुए रहते है | सभी मिल बाँट कर अपनी जैबे भरते है | इसलिए न तो कोई  किसी के ऊपर आरोप लगता है और न ही बुरे करता है |

                इसी तरह अगर हम पुलिस की बात करे तो बहुत से अनदेखी  और देखी हुई सच्चाइया सामने आती है |  पुलिस एक रिपोर्ट लिखने तक के पैसे ले लेती है तो फिर इनका सम्पूर्ण  जीवन-चरित्र कैसा हो सकता        है |    वैसे स्पष्ट तो है कि सभी लोगो का काम जनता से पैसा  लूटना ही है...,फिर वो कोई भी तरीका अपनाये, सही या गलत,     उनके लिए सभी सही |   वैसे मै तो यही कहूँगा की जो भी पुलिस या नेता बनने की इच्छा रखता है उसका एक ही मतलब रहता है-    


         पुलिस बनो, खादी पहन लो,
         जनता का पैसा खाओ 
         और जितनी जल्दी हो सके अमीर बन जाओ !!!!

                   अपने नेता-गण भी यही करते  है , कुसरी पर बैठे और दुसरे ही दिन करोड़-पति | जिनके पास कोई संपत्ति न हो, जो पहले किसी दुसरे फ़ोकट नेता की चापलूसी करता फिरता था आज वह करोडो रुपयों का मालिक हो गया है | जो पहले देशी  दारु पीता फिरता था, जो पहले सत्ता खेलता हुआ पुलिस के हाथो पकड़ाता था, जो पहले बीडी के लिए तक तरसता था ........आज वही फक्कड़ नेता पुलिसवालो को अपना नोकर  बना के रखता है और बीडी क्या है , सिगरते भी नहीं ,सिगार पीने लग गए है | देशी दारु की जगह अंग्रेजी बारो में विस्की, रम बियर पी रहे है | ये नेता और पुलिस बनने का चस्का  किसी शहर में ही नही है बल्कि  गावो में बहुत जोरो से है|   
                   एक पंचायत सदस्य से लेकर बड़े मंत्री तक का यही हाल है |  पद पर आने से पहले तो फ़ोकट थे लेकिन पद  पर    आने के बाद रईस |  नई नई गाड़िया, पैसे, शानदार माकन और बहुत कुछ | जिनके पास साईकिल तक नहीं थी वो अब बुलेरो , स्कार्पियो या सफारी या और भी महंगी गाडियों में घुमते हुए नजर आते है | गाड़िया लेन का      सबसे ज्यादा चलन गाँवों में हो गया है | जो आदमी सरपंच बना, एक महिना हुआ नहीं और बुलेरो  या  स्कार्पियो में दिखाई देता है | 

                     सबसे पहले गाडी, मकान अनिवार्य है , गाँव की, शहरो की, सडको की हालत भले ही ख़राब हो ...लेकिन अपनी हालत ख़राब नहीं होनी |सारा का सारा पैसा खा जाते हे |  कहा से होगा देश का भला ?
इसी के कारण अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब |  

                    जो अमीर है उसे ही नौकरी मिलती है , उसी को पानी मिलाता है, सब कुछ एशो-आराम  लेकिन गरीबो को कोन देगा ये ? और अपने यहाँ के तमाम नेता खा-खा कर थके  तब न | उन्हें खाने से फुर्सत मिले तब जाकर लोगो का और देश का भला हो |

                    इसमें मात्र जनता ही सुधर ला सकती है....क्योकि ये स्वतंत्र  जनता  का देश है |   अगर सभी एक साथ आगे आये तो ........................




आप क्या विचार है.....भ्रष्टो को पैसा खिलने का या इनसे लड़ने का ..??




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